दरअसल, राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों तक को इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड मापदंड के अनुसार विकसित किया जा रहा है। इस प्रयास का उद्देश्य है कि रोगियों को कम से कम समय में उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएं मिल सकें। इसके लिए 46 हजार 491 पदों पर भर्ती की [...]
Published: Thursday, 3 April 2025 at 01:42 am | Modified: Friday, 4 April 2025 at 12:12 am | By: Kapil Sharma | 📂 Category: शहर और राज्य
दरअसल, राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों तक को इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड मापदंड के अनुसार विकसित किया जा रहा है। इस प्रयास का उद्देश्य है कि रोगियों को कम से कम समय में उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएं मिल सकें। इसके लिए 46 हजार 491 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों में फोरेंसिक विशेषज्ञों की नियुक्ति की जा रही है। हर जिला अस्पताल में एक फोरेंसिक विशेषज्ञ मौजूद रहेगा, जो जटिल मामलों में पोस्टमार्टम करेगा और मेडिको लीगल ओपिनियन प्रदान करेगा। इस पहल का मुख्य लाभ यह होगा कि मेडिको लीगल मामलों में मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाना ज्यादा आसान हो जाएगा।
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इस संबंध में एक प्रस्ताव तैयार किया है। प्रत्येक अस्पताल में एक फोरेंसिक विशेषज्ञ का पद स्थापित किया जाएगा। इस समय भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में एक ही संस्थान है।
अभी उलझे हुए मामलों में सभी दस्तावेजों को भेजकर मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों से सलाह ली जाती है। वर्तमान में यह एकमात्र संस्थान भोपाल स्थित गांधी मेडिकल कॉलेज है, जो गृह विभाग के अंतर्गत आता है। इसमें नियमित, संविदा और आउटसोर्स के पद शामिल हैं।
जिला अस्पतालों में फोरेंसिक विशेषज्ञ का पद आइपीएचएस में अनिवार्य किया गया है। इसी के तहत इस पद पर भर्ती की तैयारी की जा रही है। कैबिनेट से स्वीकृति मिलने के बाद मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग से इन पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
फोरेंसिक विशेषज्ञों की नियुक्ति से कई लाभ होंगे। संवेदनशील और जटिल मामलों में पोस्टमार्टम कर फोरेंसिक विशेषज्ञ अपनी राय देंगे। इसके अलावा, पीएचसी, सीएचसी और सिविल अस्पतालों में भी ऐसे मामलों में जिला अस्पताल के फोरेंसिक विशेषज्ञों से सलाह ली जा सकेगी।
फोरेंसिक विशेषज्ञों की नियुक्ति के साथ ही शव परीक्षण और मेडिको लीगल जांच के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता भी बढ़ाई जाएगी। इससे पोस्टमार्टम रिपोर्ट की गुणवत्ता में सुधार होगा और न्यायालयों में दोषमुक्ति की तुलना में दोषसिद्धि का अनुपात भी बढ़ेगा। मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट में ओपिनियन के लिए मामलों का दबाव कम होगा।