हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को देश के प्रधानसेवक मानते हैं। जनता के दिलों में विक्रमादित्य की छवि सहजता से उपलब्ध है। उनके सुशासन के किस्से आज की शिक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने दो दशकों पहले विक्रमादित्य शोध पीठ की स्थापना की थी, जो विक्रमादित्य के जीवन मूल्यों पर आधारित महत्वपूर्ण पुस्तकें और तथ्य प्रस्तुत करती है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि मध्यप्रदेश सरकार सुशासन को ध्यान में रखते हुए अपने कार्यों को विभागवार जारी रखे हुए है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्येय वाक्य ‘विरासत से विकास की ओर’ हमारे लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो रहा है। हम विकास की योजनाओं में विरासत को एक महत्वपूर्ण स्थान दे रहे हैं।
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मध्यप्रदेश में यदि विरासत की बात करें तो सम्राट विक्रमादित्य का शासनकाल, जो लगभग 2000 वर्ष पूर्व था, सुशासन का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करता है। विक्रमादित्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं को देखें तो उनकी एक अलग छवि उभरती है। वे ऐसे शासक थे जिनके द्वारा किए गए कार्य आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं। उनके शासनकाल की तुलना सुशासन से करना एक उचित तुलना है।
आज हमारे पास हिजरी और विक्रम संवत है। विक्रम संवत एक उदार परंपरा के तहत चलता है, जिसमें शासक को अपनी प्रजा का कर्ज चुकाने का सामर्थ्य होना अनिवार्य है। इसका तात्पर्य है कि शासक के पास इतना धन होना चाहिए कि वह प्रजा को कर्ज मुक्त कर सके और उद्योग-व्यापार के लिए भी आवश्यक धन उपलब्ध करा सके। यह बात भले ही आज के लिए अविश्वसनीय लगे, लेकिन सम्राट विक्रमादित्य के शासन में यह संभव हुआ।
1 अप्रैल से विक्रम संवत 2082 का शुभारंभ हुआ है। हमारे पास संवत के 60 विभिन्न प्रकार के नाम हैं, और इस वर्ष को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सिद्धार्थ नाम दिया गया है। विक्रम संवत के नामों का चक्रीकरण समय-समय पर बदलता रहता है।
विक्रमादित्य की शासन व्यवस्था में पहली बार नवरत्नों का समूह देखने को मिला। उन्होंने नवरत्नों को 5 से 7 मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी थी। विक्रमादित्य ने अपने देश को गुलामी से मुक्त कराया। उनके नवरत्न सभी विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ थे।
उन्होंने सुशासन की व्यवस्था स्थापित की। उनके मंत्रियों में इतनी क्षमता थी कि विक्रमादित्य के अनुपस्थित रहने पर भी शासन सुचारू रूप से चलता था। यह व्यवस्था शिवाजी महाराज के अष्ट प्रधान की पद्धति में भी देखी जा सकती है।
विक्रमादित्य दानशीलता, वीरता और प्रजा का ध्यान रखने के लिए प्रसिद्ध थे। विक्रम-बेताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां उनकी शासन व्यवस्था की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।
विक्रमादित्य का असली नाम सहशांक था। उन्हें विक्रमादित्य की उपाधि दी गई थी। कई राजाओं ने खुद को विक्रमादित्य से जोड़ा है, लेकिन असली विक्रमादित्य वही हैं जिनकी राजधानी उज्जैन थी।
विक्रमादित्य की शासन व्यवस्था सुशासन का आधार है। वे एक आदर्श और जनकल्याणकारी सम्राट थे जिन्होंने खुद को कभी राजा कहलाना पसंद नहीं किया। उन्होंने अपने राज्य में 2000 साल पहले गणतंत्र की स्थापना की थी।
विक्रमादित्य के व्यक्तित्व को उजागर करने के लिए महानाट्य का आयोजन किया गया है। यह मंचन दिल्ली में 12, 13 और 14 अप्रैल को होगा, जिसमें 250 से ज्यादा कलाकार विभिन्न प्रकार के अभिनय करते नजर आएंगे।
महानाट्य में शामिल कलाकार विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर हैं। यह आयोजन मध्यप्रदेश सरकार का प्रयास है ताकि गौरवशाली इतिहास को विश्व के सामने लाया जा सके। इससे पूर्व हैदराबाद में भी विक्रमादित्य महानाट्य का आयोजन हो चुका है।
विक्रमादित्य ने अपने जीवन में मथुरा और अयोध्या जैसे 300 से अधिक स्थानों पर मंदिरों का निर्माण कराया था। उनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी भी गरीबों को आवास उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहे हैं। भारत अब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सक्षम और सशक्त बन रहा है, जो वास्तव में रामराज्य के समान है।
हमारी सरकार जनकल्याण से जुड़े निर्णय लेते हुए किसानों को 30 लाख सोलर पंप देकर उन्हें बिजली मुफ्त उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। हम विक्रमादित्य के सुशासन के भाव के अनुरूप प्रधानमंत्री मोदी के ध्येय वाक्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
सुशासन स्थापित करने के लिए विक्रमादित्य की कई कहानियां हैं। विक्रमादित्य और राजा भोज के कार्यकाल में एक हजार साल का अंतर था। जब भोज सिंहासन पर बैठने जा रहे थे तो उनकी रानी ने युद्ध में उनकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठाया।
राजा भोज ने अपनी युद्ध रणनीति बताई, तब रानी ने कहा कि वह विक्रमादित्य के शासन पर नहीं बैठ सकते, क्योंकि उनके मन में मृत्यु का भय था। युद्ध के समय जो मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है, वही विक्रमादित्य कहलाता है।